
Govardhan Puja : दिवाली की जगमगाहट के ठीक अगले दिन कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को जब अन्नकूट उत्सव (गोवर्धन पूजा) मनाया जाता है, ‘अन्नकूट’ का सरल शब्दों में अर्थ है ‘अन्न का पहाड़’. यह पर्व केवल पूजा पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रकृति, किसान, गोवंश और समाज के प्रति कृतज्ञता जताने का एक जीवंत माध्यम है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण को लगने वाले छप्पन भोग और बनने वाली विशेष पंचमेल सब्जी के पीछे गहरे धार्मिक, वैज्ञानिक और सामाजिक रहस्य छिपे हैं। बता दे कि गोवर्धन पूजा (अन्नकूट) दीपावली के ठीक अगले दिन मनाई जाती है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण और गोवर्धन पर्वत की पूजा होती है। मंदिरों व सामाजिक संगठनों की ओर से गोवर्धन पूजा की जाती है। जबकि खासतौर से गांवों में हर घर में इसकी पूजा होती है।
हिंदू पंचांग के अनुसार, गोवर्धन पूजा हर साल कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाने का विधान है। इस बार दिवाली 8 नवंबर 2026 को मनाई जाएगी। इसके अगले दिन यानी 9 नवंबर को प्रतिपदा तिथि दोपहर में शुरू हो रही है।
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गोवर्धन पूजा कब है ?
पं. राकेश झा के अनुसार, इस बार कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा तिथि 9 नवंबर 2026 को दोपहर 12 बजकर 32 मिनट पर शुरू होगी और इसका समापन 10 नवंबर 2026 को दोपहर 2 बजकर 1 मिनट पर होगा। ऐसे में शास्त्र सम्मत नियमों और उदया तिथि के अनुसार, 10 नवंबर को सूर्योदय के समय प्रतिपदा तिथि मौजूद रहेगी, इसलिए 10 नवंबर 2026, मंगलवार को ही गोवर्धन पूजा मनाई जाएगी।
गोवर्धन पूजा 2026 के शुभ मुहूर्त
प्रातःकाल पूजा मुहूर्त: सुबह 06:41 बजे से 08:51 बजे तक
अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11:44 बजे से दोपहर 12:27 बजे तक
गोधूलि मुहूर्त: शाम 05:31 बजे से 05:57 बजे तक
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रेवाड़ी में 20 जगह होगा अन्नकूट: मंदिर में इस दिन भगवान को छप्पन भोग और विभिन्न प्रकार की मिश्रित सब्जियों, पूड़ी, हलवा तथा चावल से तैयार अन्नकूट प्रसाद अर्पित किया जाता है। जगह जगह आयोजित भंडारे मे बडी संख्या में श्रऋालु प्रसाद ग्रहण करते है। रेवाड़ी बावल व धारूहेड़ा में 20 से ज्यादा जगह मंदिरो में अन्नूकट बनाया जाएगा।
जानिए क्या है छप्पन भोग: बता दे कि छप्पन भोग के पीछे की कथा द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीला से जुड़ी है। जब इंद्रदेव के कोप से ब्रज में मूसलाधार बारिश हुई, तब कान्हा ने पूरे गोकुल की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी सबसे छोटी उंगली पर उठा लिया था। बताया जा रहा है कि लगातार 7 दिनों तक पर्वत उठाए रखने के दौरान श्रीकृष्ण ने अन्न जल का एक दाना तक ग्रहण नहीं किया। मान्यता है कि भगवान दिन में 8 बार (आठों प्रहर) भोजन करते थे।
जब सातवें दिन संकट टला, तो माता यशोदा और ब्रजवासियों ने प्रभु के इन 7 दिनों के छूटे हुए 8 प्रहरों की भरपाई के लिए प्रेमपूर्वक 56 प्रकार के पकवान (7 × 8 = 56) तैयार किए थे
आध्यात्मिक दृष्टि से 56 संख्या का संबंध कान्हा की बांसुरी के 7 सुरों/छिद्रों और संगीत के 8 मुख्य रागों से भी माना जाता है, जो ईश्वर और भक्त के मिलन के आनंद को दर्शाते हैंं। मंदिरों में छप्पन भोग को मनमाने ढंग से नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित क्रम में सजाया जाता है। माखन, मिश्री, मलाई, पेड़ा, रबड़ी और रसमलाई जैसी शुद्ध दुग्ध सामग्रियां रखी जाती हैं। इसके ठीक बाद कचौड़ी, पूरी, मठरी और नमकीन फरसाण सजाए जाते हैं। सबसे नीचे कढ़ी, दाल, भारी अनाज और खिचड़ी रखी जाती है। थाली के ठीक बीच में पके हुए चावल का विशाल ढेर बनाया जाता है, जो साक्षात गोवर्धन पर्वत का प्रतीक है। Govardhan Puja
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