
Haryana News (Best E News) हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा को करीब 14 साल पुराने रैक्सिल फफूंदनाशक खरीद मामले में बड़ी राहत मिली है। पंचकूला की सीबीआई विशेष अदालत ने इस मामले में जांच एजेंसी की ओर से दाखिल क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया है। इसके साथ ही हुड्डा और दो वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों के खिलाफ चल रहा यह मामला अब खत्म हो गया है।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि सीबीआई की लंबी जांच के दौरान ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि अधिकारियों ने आपस में कोई साजिश रची थी या सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाने के लिए जानबूझकर गलत फैसला लिया था। जांच में किसी अधिकारी को निजी फायदा पहुंचाने की बात भी सामने नहीं आई।
अदालत ने यह भी माना कि रैक्सिल दवा का चुनाव बिना किसी आधार के नहीं किया गया था। साल 2003 में ही चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने गेहूं की फसल को तीन प्रमुख बीमारियों से बचाने के लिए इस दवा की सिफारिश की थी।
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खरीद की कीमतों को लेकर भी जांच में कोई गड़बड़ी नहीं मिली। हरियाणा सीड डेवलपमेंट कॉरपोरेशन ने जिस कीमत पर दवा खरीदी थी उसी दर पर पंजाब स्टेट सीड कॉरपोरेशन और नेशनल सीड्स कॉरपोरेशन ने भी खरीदारी की थी। वहीं हाई पावर परचेज कमेटी की ओर से सप्लाई ऑर्डर में बेस्ट डीलर रेट की शर्त हटाने के पीछे भी किसी गलत मंशा का सबूत नहीं मिला।
दरअसल पूरा मामला अक्टूबर 2010 का है। उस समय हरियाणा में गेहूं के प्रमाणित बीजों के उपचार के लिए बायर कंपनी की रैक्सिल दवा को जरूरी किया गया था। आरोप लगे थे कि तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा की अध्यक्षता वाली बैठक में एक खास फर्म को फायदा पहुंचाने के लिए यह फैसला लिया गया और महंगे दामों पर दवा खरीदी गई।
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साल 2015 में राज्य के सतर्कता विभाग की सिफारिश पर केंद्र सरकार ने इस मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी थी। इसके बाद भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी से जुड़ी धाराओं में एफआईआर दर्ज हुई।
इस मामले में हरियाणा सरकार ने भी सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट पर सहमति जताई थी और कोई आपत्ति नहीं की। अब अदालत की मंजूरी के बाद भूपेंद्र सिंह हुड्डा को इस पुराने मामले से बड़ी कानूनी राहत मिल गई है।